बंदूक नहीं, सोच है नया हथियार: ‘दिमागी नक्सलवाद’ पर बड़ी चेतावनी
लखनऊ, 18 अगस्त 2026 प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा लाल किले की प्राचीर से ‘दिमागी नक्सल’ के खतरे को लेकर दी गई चेतावनी ने देश में नक्सलवाद के बदलते स्वरूप पर नई चर्चा छेड़ दी है। इस बहस का केंद्र केवल हथियारबंद हिंसा नहीं, बल्कि वह वैचारिक प्रभाव भी है, जिसे लेखक युवाओं के मन में राष्ट्र, लोकतंत्र, सुरक्षा बलों, न्यायपालिका, संविधान और संवैधानिक संस्थाओं के प्रति अविश्वास पैदा करने की कोशिश से जोड़ते हैं। लेखक के अनुसार, ये ‘दिमागी नक्सली’ जंगलों या दूरदराज के ग्रामीण इलाकों में नहीं, बल्कि शहरों में सक्रिय रहते हैं और प्रोफेसर, लेखक, पत्रकार, एनजीओ संचालक, कलाकार या दलित-ओबीसी-आदिवासी चिंतक के रूप में अपनी भूमिका निभाते हैं। सेमिनारों और अन्य माध्यमों के जरिए नक्सली विचारधारा को समर्थन देने और फंड जुटाने का प्रयास किया जाता है, ताकि पशुपति से तिरुपति तक भारत में ‘लाल गलियारे’ का निर्माण किया जा सके। अपने पुलिस सेवा के अनुभव का उल्लेख करते हुए लेखक ने वर्ष 2009-10 की एक घटना साझा की, जब उन्होंने नक्सली नेता चिंतन दा से पूछताछ की थी। सिंदरी से इंजीनियरिंग और जेएनयू से एमफिल व पीएचडी करने वाला चिंतन भाकपा माओवादी की केंद्रीय समिति का सदस्य था और उसे उत्तर बिहार, उत्तर प्रदेश तथा उत्तराखंड की जिम्मेदारी सौंपी गई थी। पूछताछ के दौरान चिंतन दा ने बताया कि झारखंड, बिहार, छत्तीसगढ़ और ओडिशा जैसे इलाकों में संगठन को इसलिए सफलता मिली क्योंकि वहां एक ‘वैक्यूम’ मौजूद था, जिसे उन्होंने ‘ऑक्यूपाई’ किया। इसके विपरीत उत्तर प्रदेश के चंदौली, मिर्जापुर और सोनभद्र में प्रशासन ने कम्युनिटी पुलिसिंग के जरिए शुरुआत में ही इस स्थिति को बनने से रोक दिया। आदिवासी परिवारों की मदद, बच्चों को निःशुल्क किताबें और बैग, चिकित्सा सुविधाएं, युवाओं को पुलिस भर्ती के लिए विशेष प्रशिक्षण तथा ड्राइविंग प्रशिक्षण और लाइसेंस जैसी पहल ने प्रशासन और स्थानीय लोगों के बीच संपर्क मजबूत किया। लेखक के मुताबिक, नक्सली रणनीति सीधे सशस्त्र क्रांति से शुरू होने वाली नहीं थी। पहले किसानों, बालू माफिया और भू-माफिया जैसे मुद्दों पर लोगों को संगठित करने और फिर दूसरे चरण में सशस्त्र विद्रोह की दिशा में बढ़ने की योजना थी। पुलिस ने ऐसे लोगों की पहचान कर कार्रवाई की, वहीं आम नागरिकों और किसानों की वाजिब शिकायतों का समाधान भी कराया गया। प्रधानमंत्री की चेतावनी का व्यापक संदेश यही है कि युवाओं को भ्रम और नकारात्मकता के बजाय शिक्षा, नवाचार और राष्ट्र-निर्माण की दिशा में आगे बढ़ना चाहिए। लेखक के अनुसार, किसी भी कट्टर विचारधारा से मुकाबले के लिए केवल सुरक्षा कार्रवाई पर्याप्त नहीं है; समाज में उपेक्षा, असंतोष और अविश्वास की उन स्थितियों को भी दूर करना जरूरी है, जिनका इस्तेमाल ऐसे संगठन अपने प्रभाव को बढ़ाने के लिए कर सकते हैं। यही कारण है कि ‘दिमागी नक्सलवाद’ पर शुरू हुई यह बहस राष्ट्रीय सुरक्षा के साथ-साथ युवाओं की सोच और देश के लोकतांत्रिक भविष्य से भी जुड़ जाती है।