बहुपक्षीय मंच, कूटनीतिक बिसातः बिश्केक में बुना गया रणनीतिक संबंधों का ताना-बाना
बिश्केक। शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) की 25वीं वर्षगांठ के ऐतिहासिक अवसर पर आयोजित 26वें शिखर सम्मेलन ने यूरेशियाई क्षेत्र में भारत की बदलती और मजबूत होती कूटनीतिक हैसियत की एक नई इबारत लिख दी है। यह आयोजन केवल एक बहुपक्षीय बैठक भर नहीं था, बल्कि वैश्विक मंच पर भारत के बढ़ते प्रभाव और उसकी कूटनीतिक परिपक्वता का एक शानदार प्रदर्शन था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने किर्गिज गणराज्य की राजधानी बिश्केक में आयोजित इस सम्मेलन में भारत का नेतृत्व किया। प्रधानमंत्री मोदी के साथ इस यात्रा पर विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर भी रहे, जिन्होंने विभिन्न देशों के शीर्ष नेताओं से मुलाकात कर द्विपक्षीय संबंधों की समीक्षा की और इस वैश्विक मंच का भारत के पक्ष में शानदार कूटनीतिक उपयोग किया। इस वैश्विक मंच पर भारत का रुख अत्यंत मुखर और नीतिगत रहा, जिसके दूरगामी व बेहद सकारात्मक आउटकम (परिणाम) निकलकर सामने आए। भारत ने इस मंच का उपयोग न केवल अपनी सुरक्षा चिंताओं को उठाने के लिए किया, बल्कि सदस्य देशों के साथ दीर्घकालिक आर्थिक साझेदारी का खाका भी खींचा। भारत के लिए इस सम्मेलन की सबसे बड़ी रणनीतिक सफलताओं में से एक रही, 'एससीओ सभ्यता संवाद मंच' के पहले संस्करण की मेज़बानी मिलना। इस ऐतिहासिक पहल के जरिए भारत अब मध्य एशिया के देशों के साथ सदियों पुराने सांस्कृतिक और व्यापारिक रिश्तों को आधुनिक रूप में पुनर्जीवित करने का नेतृत्व करेगा। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने ‘एक्स’ पर लिखा प्रधानमंत्री ने भारत का यह रुख दोहराया कि बातचीत और कूटनीति ही विवादों को सुलझाने का एकमात्र रास्ता है। उन्होंने आतंकवाद के प्रति ज़ीरो टॉलरेंस की ज़रूरत पर ज़ोर दिया और इस बात पर भी बल दिया कि आतंकवाद के ख़िलाफ़ लड़ाई में कोई दोहरा मापदंड नहीं होना चाहिए। प्रधानमंत्री ने कनेक्टिविटी, टेक्नोलॉजी, इनोवेशन, स्टार्टअप और युवाओं की भागीदारी के महत्व को रेखांकित किया। उन्होंने पहले एससीओ सिविलाइज़ेशन डायलॉग फ़ोरम की मेज़बानी करने के लिए भारत की तैयारी की भी घोषणा की। सम्मेलन के अंत में जारी 'बिश्केक घोषणापत्र' में भारत के उन प्रस्तावों को प्रमुखता से स्थान मिला, जो लंबे समय से वैश्विक मंचों पर भारत की प्राथमिकता रहे हैं। इसमें जलवायु परिवर्तन, ऊर्जा संरक्षण, और परमाणु सुरक्षा जैसे गंभीर मुद्दों पर चार महत्वपूर्ण एमओयू पर मुहर लगी, जिससे यूरेशियाई देशों के बीच सहयोग का एक नया ढांचा तैयार हुआ है। वहीं दूसरी ओर डॉ. जयशंकर ने भारत की 'बैकचैनल डिप्लोमेसी' का नेतृत्व करते हुए मध्य एशियाई देशों, रूस, चीन और ईरान के विदेश मंत्रियों व शीर्ष नेताओं के साथ अलग से बैठकें करके व्यापार, क्षेत्रीय कनेक्टिविटी और समुद्री सुरक्षा पर गंभीर चर्चा की। विशेष रूप से ईरान के नेतृत्व के साथ हुई बातचीत में चाबहार बंदरगाह के विस्तार और भारतीय नाविकों के हितों की रक्षा जैसे संवेदनशील मुद्दों पर कूटनीतिक सहमति बनाने में बड़ी सफलता मिली। विदेश मंत्री की इन मुलाकातों ने विभिन्न देशों के साथ भारत के द्विपक्षीय मतभेदों को कम करने और सहयोग के नए सेतु बनाने का काम किया। (रिपोर्ट. शाश्वत तिवारी)