डॉ. सुधांशु त्रिवेदी का वक्तव्य: सोमनाथ केवल मंदिर नहीं, भारत की चेतना और समृद्धि का प्रतीक

By Tatkaal Khabar / 05-01-2026 12:48:01 pm | 157 Views | 0 Comments
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सोमनाथ मंदिर केवल आस्था का केंद्र नहीं, बल्कि भारत की राष्ट्रीय चेतना, आत्मसम्मान और ऐतिहासिक संघर्ष का जीवंत प्रतीक है। यह विचार भाजपा सांसद और वरिष्ठ नेता डॉ. सुधांशु त्रिवेदी ने व्यक्त करते हुए कहा कि सोमनाथ की कहानी भारत के उत्थान और पुनर्जागरण की कहानी है। डॉ. सुधांशु त्रिवेदी ने 11 मई 1951 का उल्लेख करते हुए कहा कि सोमनाथ पुनर्स्थापना के अवसर पर भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने जो कहा था, वह आज भी उतना ही प्रासंगिक है। डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने स्पष्ट किया था कि सोमनाथ की पूर्ण प्रतिष्ठा केवल भव्य मंदिर निर्माण से नहीं होगी, बल्कि उस दिन मानी जाएगी जब भारत फिर से उसी समृद्धि के शिखर पर पहुंचेगा, जिसकी ओर आकर्षित होकर उस पर बार-बार क्रूर आक्रमण किए गए। डॉ. त्रिवेदी ने याद दिलाया कि वर्ष 1026, यानी लगभग एक हजार वर्ष पहले, सोमनाथ पर हुए पहले आक्रमण और वहां के लोगों के साथ की गई अमानवीय क्रूरता का वर्णन कई ऐतिहासिक स्रोतों में मिलता है। उन्होंने कहा कि इन घटनाओं को पढ़ते समय आज भी हृदय कांप उठता है, क्योंकि हर पंक्ति में विध्वंस और पीड़ा के गहरे निशान दिखाई देते हैं। उन्होंने कहा कि स्वतंत्र भारत में सरदार वल्लभभाई पटेल के प्रयासों से सोमनाथ के पुनर्निर्माण का सपना साकार हुआ। तत्कालीन विरोधों के बावजूद, 1951 में डॉ. राजेंद्र प्रसाद की उपस्थिति में मंदिर पुनर्स्थापित हुआ। यह केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि राष्ट्र के आत्मविश्वास की पुनर्स्थापना थी। डॉ. सुधांशु त्रिवेदी ने कहा कि आज प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत जिस गति से आगे बढ़ रहा है, वह डॉ. राजेंद्र प्रसाद के उस ऐतिहासिक संकल्प को साकार करता दिख रहा है। भारत आज दुनिया की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था, चौथा सबसे बड़ा स्टॉक एक्सचेंज, तीसरा सबसे बड़ा ऑटोमोबाइल निर्माता, दूसरा सबसे बड़ा मोबाइल हैंडसेट निर्माता और डिजिटल ट्रांजैक्शन में विश्व में प्रथम स्थान पर है। साथ ही, भारत लगातार दो वर्षों से प्रमुख वैश्विक अर्थव्यवस्थाओं में सबसे तेज़ी से बढ़ती अर्थव्यवस्था रहा है। उन्होंने कहा कि यही वह क्षण है, जब सोमनाथ से जुड़ा संकल्प पूर्णता की ओर बढ़ता हुआ दिखाई देता है—जहां आस्था, इतिहास और समृद्धि एक साथ खड़े हैं।