भाषा शहीद दिवस पर स्टालिन का संदेश: तमिल अस्मिता के सामने हिंदी को कभी नहीं मिलेगी जगह

By Tatkaal Khabar / 25-01-2026 06:08:15 am | 6 Views | 0 Comments
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चेन्नई | 25 जनवरी 2026 भाषा शहीद दिवस के अवसर पर तमिलनाडु के मुख्यमंत्री और डीएमके अध्यक्ष एमके स्टालिन ने एक बार फिर हिंदी थोपे जाने के मुद्दे पर केंद्र सरकार और नई शिक्षा नीति (NEP) के खिलाफ कड़ा रुख जाहिर किया। राज्य के ‘भाषा शहीदों’ को श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए स्टालिन ने साफ शब्दों में कहा, “तमिलनाडु में हिंदी के लिए ‘न तब जगह थी, न है और न ही कभी होगी।’” उनका यह बयान एक बार फिर भाषा और पहचान को लेकर चल रही राष्ट्रीय बहस को केंद्र में ले आया है। सीएम स्टालिन ने सोशल मीडिया पर साझा अपने संदेश में कहा कि तमिलनाडु ऐसा राज्य है, जिसने अपनी भाषा को जीवन की तरह प्रेम किया है और हिंदी थोपे जाने के हर प्रयास का एकजुट होकर विरोध किया है। उन्होंने कहा कि राज्य ने हमेशा अपनी भाषाई पहचान और सांस्कृतिक आत्मसम्मान की रक्षा की है। स्टालिन के अनुसार, हिंदी थोपने के प्रयासों के खिलाफ तमिलनाडु का संघर्ष केवल भाषा तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह अधिकार और सम्मान की लड़ाई भी रही है। इस मौके पर मुख्यमंत्री ने हिंदी विरोधी आंदोलन के इतिहास से जुड़ा एक संक्षिप्त वीडियो भी साझा किया। वीडियो में 1965 के दौरान चरम पर पहुंचे हिंदी विरोधी आंदोलन, उसमें शहीद हुए लोगों और डीएमके के दिवंगत नेताओं सीएन अन्नादुराई तथा एम करुणानिधि के योगदान को दिखाया गया है। स्टालिन ने कहा कि तमिलनाडु ने हिंदी विरोधी आंदोलन का नेतृत्व कर उपमहाद्वीप में विभिन्न भाषाई समुदायों के अधिकार और पहचान की रक्षा की। उन्होंने तमिल भाषा के लिए अपने प्राण न्योछावर करने वाले शहीदों को नमन करते हुए यह भी कहा कि अब भाषा के नाम पर कोई और जान नहीं जानी चाहिए, लेकिन तमिल के प्रति प्रेम कभी खत्म नहीं होगा। गौरतलब है कि तमिलनाडु में ‘भाषा शहीद’ उन लोगों को कहा जाता है, जिन्होंने 1964-65 के दौरान हिंदी विरोधी आंदोलन में मुख्य रूप से आत्मदाह के जरिए अपने प्राणों की आहुति दी थी। डीएमके सरकार आज भी तमिल और अंग्रेजी की दो-भाषा नीति का पालन करती है और केंद्र की नई शिक्षा नीति 2020 पर हिंदी थोपने का आरोप लगाती रही है। द्रविड़ आंदोलन से निकली डीएमके की राजनीति में हिंदी विरोध ऐतिहासिक, वैचारिक और राजनीतिक आधार पर टिका हुआ है, जिसे पार्टी तमिल भाषा, संस्कृति और पहचान की रक्षा का माध्यम मानती है। भाषा शहीद दिवस पर स्टालिन का स्पष्ट संदेश: तमिलनाडु में हिंदी को लेकर कोई समझौता नहीं भाषा शहीद दिवस के अवसर पर तमिलनाडु के मुख्यमंत्री और डीएमके अध्यक्ष एमके स्टालिन ने राज्य के भाषा आंदोलन से जुड़े शहीदों को श्रद्धांजलि दी। इस दौरान उन्होंने हिंदी थोपे जाने के मुद्दे पर दो टूक बात कही। स्टालिन ने कहा, “तमिलनाडु में हिंदी के लिए ‘न तब जगह थी, न है और न ही कभी होगी।’” उनके इस बयान से एक बार फिर राज्य सरकार का रुख साफ हो गया है। मुख्यमंत्री ने सोशल मीडिया पर जारी अपने संदेश में कहा कि तमिलनाडु वह भूमि है, जहां भाषा को केवल बोलचाल का माध्यम नहीं, बल्कि जीवन और आत्मसम्मान का हिस्सा माना जाता है। उन्होंने कहा कि जब-जब हिंदी को थोपने की कोशिश हुई, तब-तब राज्य के लोगों ने एकजुट होकर उसका विरोध किया। स्टालिन के अनुसार, यह संघर्ष भाषा के साथ-साथ पहचान और अधिकारों की रक्षा का भी रहा है। इस मौके पर स्टालिन ने हिंदी विरोधी आंदोलन के इतिहास से जुड़ा एक छोटा वीडियो भी साझा किया। वीडियो में 1965 के हिंदी विरोधी आंदोलन, उसमें शहीद हुए लोगों और डीएमके के वरिष्ठ नेताओं सीएन अन्नादुराई और एम करुणानिधि के योगदान को दिखाया गया है। मुख्यमंत्री ने कहा कि तमिलनाडु ने इस आंदोलन के जरिए देश के विभिन्न भाषाई समुदायों के अधिकारों की आवाज बुलंद की। उन्होंने शहीदों को नमन करते हुए कहा कि भविष्य में भाषा के नाम पर किसी की जान नहीं जानी चाहिए, लेकिन तमिल के प्रति प्रेम और सम्मान हमेशा बना रहेगा। गौरतलब है कि तमिलनाडु में ‘भाषा शहीद’ उन लोगों को कहा जाता है, जिन्होंने 1964-65 के दौरान हुए हिंदी विरोधी आंदोलन में अपने प्राणों की आहुति दी थी। डीएमके सरकार आज भी तमिल और अंग्रेजी की दो-भाषा नीति पर कायम है और केंद्र की नई शिक्षा नीति 2020 को हिंदी थोपने की कोशिश बताकर उसका विरोध करती रही है। द्रविड़ आंदोलन से जुड़ी डीएमके की विचारधारा में भाषा और संस्कृति की रक्षा को हमेशा प्राथमिकता दी गई है।