चैत्र नवरात्रि 2026: महाअष्टमी और रामनवमी पर करें कन्या पूजन, जानें पूजा की शुभ मुहूर्त
चैत्र नवरात्रि के पावन पर्व में अष्टमी और नवमी तिथि का विशेष धार्मिक महत्व माना जाता है। इन दोनों दिनों में देवी दुर्गा की आराधना अपने चरम पर होती है और भक्त पूरे श्रद्धाभाव से पूजा-अर्चना करते हैं। वर्तमान में चैत्र नवरात्रि का समापन नजदीक है और ऐसे में अष्टमी व नवमी को लेकर श्रद्धालुओं के बीच उत्साह के साथ-साथ मुहूर्त को लेकर जिज्ञासा भी बनी रहती है। कई लोग अष्टमी के दिन व्रत खोलते हुए कन्या पूजन करते हैं, जबकि कुछ भक्त नवमी तिथि को यह अनुष्ठान सम्पन्न करते हैं।
कन्या पूजन का धार्मिक महत्व
नवरात्रि के नौ दिनों में मां दुर्गा के विभिन्न स्वरूपों की पूजा की जाती है। इन नौ दिनों के अंत में कन्या पूजन को अत्यंत महत्वपूर्ण माना गया है। मान्यता है कि छोटी कन्याओं में देवी का वास होता है और उनकी पूजा करने से घर में सुख, शांति और समृद्धि का वातावरण बनता है। यही कारण है कि नवरात्रि का समापन कन्या पूजन के साथ करना शुभ माना जाता है। इस परंपरा को कंजक पूजा के नाम से भी जाना जाता है, जिसमें कन्याओं को देवी के नौ स्वरूपों का प्रतीक मानकर सम्मान दिया जाता है।
अष्टमी पर कन्या पूजन का शुभ समय
अष्टमी तिथि के दिन कन्या पूजन के लिए प्रातःकाल का समय विशेष रूप से शुभ माना गया है। इस दिन सुबह 6 बजकर 20 मिनट से 7 बजकर 52 मिनट तक का समय पूजा के लिए अनुकूल रहेगा। इसके अलावा दिन में दूसरा शुभ काल 10 बजकर 56 मिनट से दोपहर 2 बजकर 1 मिनट तक रहेगा, जिसमें श्रद्धालु अपनी सुविधा अनुसार कन्या पूजन कर सकते हैं।
नवमी के दिन कन्या पूजन का समय
नवमी तिथि, जिसे रामनवमी के रूप में भी मनाया जाता है, इस दिन भी कई लोग कन्या पूजन करते हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन सुबह 10 बजकर 6 मिनट से पहले कन्या पूजन सम्पन्न करना शुभ माना जाता है। इस समयावधि में पूजा करने से विशेष आध्यात्मिक संतुष्टि प्राप्त होती है।
कन्या पूजन की सरल विधि
कन्या पूजन के लिए सामान्यतः 2 से 10 वर्ष की नौ कन्याओं को आमंत्रित किया जाता है। जब कन्याएं घर आएं तो उनका आदरपूर्वक स्वागत करते हुए उनके चरण धोए जाते हैं। इसके बाद उन्हें स्वच्छ स्थान पर बैठाकर तिलक लगाया जाता है और कलावा बांधा जाता है। श्रद्धा और प्रसन्नता के साथ उन्हें पारंपरिक भोजन जैसे हलवा, चना और पूरी परोसी जाती है। भोजन के पश्चात कन्याओं को उपहार देकर उनका आशीर्वाद लिया जाता है। अंत में उन्हें सम्मानपूर्वक विदा किया जाता है। इस पूरी प्रक्रिया में कन्याओं को देवी के रूप में मानकर उनकी पूजा की जाती है।