हिमालयी तबाही पर पीएम शाह की चेतावनी, मृतकों की संख्या 1,100 के पार

By Tatkaal Khabar / 02-09-2026 02:58:32 am | 67 Views | 0 Comments
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नई दिल्ली, 02 सितंबर 2026 नेपाल में आई विनाशकारी फ्लैश फ्लड ने एक बार फिर हिमालयी क्षेत्र की बढ़ती जलवायु संवेदनशीलता को दुनिया के सामने ला खड़ा किया है। त्रासदी के आठ दिन बाद मृतकों की संख्या 1,100 से अधिक हो चुकी है, जबकि हजारों लोग अब भी लापता हैं। प्रधानमंत्री बालेंद्र शाह ने इस आपदा को केवल नेपाल की चुनौती नहीं, बल्कि जलवायु परिवर्तन से जूझ रहे पूरे हिमालयी क्षेत्र के लिए गंभीर चेतावनी बताया है। नेपाली संसद के निचले सदन, प्रतिनिधि सभा को संबोधित करते हुए शाह ने कहा कि हिमालय में जलवायु परिवर्तन के परिणाम अब पर्यावरण तक सीमित नहीं हैं। उनका असर लोगों की जान, बस्तियों, बुनियादी ढांचे और भविष्य की सुरक्षा पर सीधे पड़ रहा है। राष्ट्रीय आपदा जोखिम न्यूनीकरण एवं प्रबंधन प्राधिकरण (एनडीआरआरएमए) के अनुसार, बुधवार सुबह 9 बजे तक बाढ़ में बह गए 1,114 लोगों के शव बरामद किए जा चुके थे, जबकि लगभग 3,916 लोग अभी भी लापता हैं। शाह ने कहा, “जलवायु परिवर्तन के प्रभाव से अचानक सामने आई इस बड़ी आपदा ने हमें चौबीसों घंटे नुकसान को नियंत्रित करने में जुटे रहने को मजबूर कर दिया है। साथ ही हमारे मन में एक गहरा सवाल भी उठा है कि आखिर यह आपदा हमारे सामने कैसे आई?” विशेषज्ञों के आकलन के मुताबिक, नेपाल-चीन सीमा के पास भोटेकोशी नदी की सहायक लेंगडे खोला में हिमस्खलन के बाद पानी का एक प्राकृतिक अवरोध बन गया था। इसके पीछे जमा पानी का दबाव बढ़ता गया और आखिरकार प्राकृतिक बांध टूटने पर भारी मात्रा में पानी, कीचड़ और मलबा तेज रफ्तार से नीचे की ओर बह निकला। बाढ़ त्रिशूली नदी की दिशा में आगे बढ़ी और रास्ते में बस्तियों तथा महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे को भारी नुकसान पहुंचाया। शाह ने कहा कि विशेषज्ञ इस घटना को हिमालय में जलवायु परिवर्तन से बढ़ते खतरों की बड़ी चेतावनी मान रहे हैं। उन्होंने कहा, “हमें जलवायु परिवर्तन के परिणामस्वरूप सामने आ रही आपदाओं के बारे में अंतरराष्ट्रीय समुदाय को जागरूक करना होगा। जलवायु परिवर्तन एक वैश्विक चुनौती है। इसके प्रभावों से निपटना और उन्हें कम करने के प्रयास पूरे वैश्विक समुदाय की साझा जिम्मेदारी हैं।” बाढ़ से पहले लोगों तक चेतावनी पहुंचाने में सरकार की भूमिका पर उठे सवालों का जवाब देते हुए शाह ने कहा, “जैसे ही हमें जानकारी मिली कि बाढ़ आ रही है, हमारे सुरक्षा कर्मियों को लोगों को सतर्क करने के लिए तैनात किया गया। हालांकि, वे खुद इस अभियान के दौरान लापता हो गए।” उन्होंने राहत एवं बचाव कार्यों में सामने आई कठिनाइयों का भी जिक्र किया। भारी कीचड़, मलबे और दुर्गम भौगोलिक परिस्थितियों के कारण शुरुआती समय में प्रभावित इलाकों तक पहुंचना बेहद मुश्किल था। खुदाई करने वाली मशीनें घटनास्थल तक नहीं पहुंच सकीं और सेना व सशस्त्र पुलिस बल के जवानों के लिए भी सुरक्षित जमीन उपलब्ध नहीं थी। शाह ने इस स्थिति को “असाधारण स्थिति” बताया और कहा कि बचावकर्मियों ने जहां तक संभव हुआ, रेंगकर प्रभावित क्षेत्रों तक पहुंचने की कोशिश की। स्थिर जमीन और हेलीकॉप्टरों के उतरने के लिए उपयुक्त जगह मिलने के बाद ही बड़े स्तर पर बचाव अभियान शुरू किया जा सका। अंतरराष्ट्रीय सहायता स्वीकार करने को लेकर सामने आई मीडिया रिपोर्टों पर प्रधानमंत्री शाह ने स्पष्ट किया कि नेपाल की सरकार की बड़े पैमाने की आपदाओं के दौरान विदेशी मदद ठुकराने की कोई नीति नहीं है। उन्होंने बताया कि शुरुआत से ही विभिन्न देशों के साथ जरूरत के मुताबिक सहायता के लिए समन्वय किया गया। भारत और चीन ने तकनीकी विशेषज्ञ भेजे, जिन्होंने पहले ही दिन से नेपाली तकनीकी टीम और सेना के साथ मिलकर प्रभावित क्षेत्रों का हवाई और तकनीकी आकलन शुरू कर दिया था। शाह ने भारत, चीन, अमेरिका, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया, जापान, दक्षिण कोरिया, संयुक्त अरब अमीरात, कतर, स्विट्जरलैंड, सिंगापुर, पाकिस्तान, श्रीलंका और बांग्लादेश समेत कई देशों का आभार जताया। एशियाई विकास बैंक, विश्व बैंक, यूरोपीय संघ और संयुक्त राष्ट्र जैसी संस्थाओं ने भी नेपाल की आपदा प्रतिक्रिया में सहयोग किया है। इस भीषण त्रासदी के बीच नेपाल ने साफ संकेत दिया है कि हिमालय पर मंडराता जलवायु संकट सीमाओं में बंधी समस्या नहीं है और इससे निपटने के लिए वैश्विक सहयोग की जरूरत पहले से कहीं अधिक है।