यूएन बैठक में भारत ने समुद्री स्वतंत्रता, नाविकों की रक्षा को बताया अनिवार्य
न्यूयॉर्क। संयुक्त राष्ट्र के मंच पर भारत ने एक बार फिर वैश्विक सुरक्षा व्यवस्था में व्यापक सुधार, उभरती तकनीकों के समान वितरण और समुद्री व्यापार की रक्षा को लेकर अपना मजबूत रुख स्पष्ट किया है। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (यूएनएससी) में 'उभरती प्रौद्योगिकियों और समुद्री सुरक्षा' विषय पर आयोजित एक उच्च स्तरीय खुली बहस में भारत ने वाणिज्यिक जहाजों पर हालिया हमलों की कड़े शब्दों में निंदा की। बैठक में भारत का प्रतिनिधित्व करते हुए यूएन में भारत के स्थायी प्रतिनिधि राजदूत पी. हरीश ने महासागर को वैश्विक व्यापार की जीवनरेखा बताते हुए कहा अंतरराष्ट्रीय कानून और 'यूनाइटेड नेशंस कन्वेंशन ऑन द लॉ ऑफ द सी' के अनुरूप, समुद्री आवाजाही की स्वतंत्रता, निर्बाध समुद्री व्यापार और नाविकों की सुरक्षा सुनिश्चित करना बेहद अनिवार्य है। उन्होंने आगाह किया कि महत्वपूर्ण समुद्री चोक पॉइंट्स पर होने वाले व्यवधानों के प्रभाव भौगोलिक सीमाओं से परे होते हैं, जो वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला को बाधित करते हैं और उच्च लागत के कारण विकासशील देशों को सबसे अधिक प्रभावित करते हैं। राजदूत हरीश ने एआई और स्वायत्त प्रणालियों जैसी उभरती तकनीकों के दोहरे पहलुओं को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि ये तकनीकें सुरक्षा बढ़ाने के अवसर तो देती हैं, लेकिन दुरुपयोग होने पर नए साइबर खतरे भी पैदा करती हैं। भारत ने दोटूक शब्दों में कहा कि तकनीकी प्रगति से वैश्विक असमानता नहीं बढ़नी चाहिए। विकासशील देशों की इन उभरती प्रौद्योगिकियों, प्रशिक्षण और क्षमता विकास तक समान पहुंच होनी चाहिए। साथ ही, अंतरराष्ट्रीय सहयोग को मजबूत करते हुए 'अंतरराष्ट्रीय समुद्री संगठन' (आईएमओ) जैसी संस्थाओं के मौजूदा जनादेशों का पूरा सम्मान किया जाना चाहिए। भारत ने यह भी साफ किया कि समुद्री सुरक्षा और एआई वर्ष 2028-29 के लिए सुरक्षा परिषद की उसकी अस्थायी सदस्यता की दावेदारी के मुख्य एजेंडे में शामिल हैं। इससे पहले, 'यूएन80 पहल' के तहत 'जनादेश कार्यान्वयन समीक्षा' पर गठित तदर्थ कार्य समूह की एक अनौपचारिक बैठक आयोजित हुई, जिसमें भारतीय मिशन के काउंसलर सुरेंद्र अधाना ने संयुक्त राष्ट्र के ढांचे में व्यापक सुधारों की वकालत की। उन्होंने जोर देकर कहा कि वर्तमान और भविष्य की बहुआयामी वैश्विक चुनौतियों से प्रभावी ढंग से निपटने के लिए संयुक्त राष्ट्र के ढांचे और उसके संस्थागत जनादेशों में आज की समकालीन भू-राजनीतिक वास्तविकताओं की झलक मिलनी चाहिए। उन्होंने स्पष्ट किया कि समीक्षा की यह प्रक्रिया सुरक्षा परिषद सहित यूएन के सभी प्रमुख अंगों पर लागू होनी चाहिए, ताकि यह वैश्विक संस्था अधिक प्रासंगिक और प्रभावी बनी रह सके। (रिपोर्ट. शाश्वत तिवारी)