उत्तराखंड में आवारा पशुओं पर सख्ती, दुर्घटनाओं की रोकथाम को लागू हुई नई एसओपी

By Tatkaal Khabar / 03-01-2026 12:40:53 pm | 1259 Views | 0 Comments
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देहरादून। उत्तराखंड में आवारा कुत्तों और निराश्रित गोवंश से होने वाली सड़क दुर्घटनाओं और जनसुरक्षा से जुड़ी घटनाओं पर लगाम लगाने के लिए राज्य सरकार ने बड़ा कदम उठाया है। शहरी विकास विभाग ने इसके लिए मानक परिचालन कार्यविधि (एसओपी) लागू कर दी है, जिसके तहत शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में जिम्मेदारियां स्पष्ट की गई हैं और एक मजबूत, तकनीक आधारित निगरानी तंत्र तैयार किया गया है। एसओपी का मुख्य उद्देश्य राष्ट्रीय राजमार्गों, एक्सप्रेस-वे और भीड़भाड़ वाले सार्वजनिक स्थलों पर आवारा पशुओं की आवाजाही को नियंत्रित करना है, ताकि दुर्घटनाओं में कमी लाई जा सके। इसके तहत शहरी क्षेत्रों में शहरी विकास विभाग और ग्रामीण इलाकों में पंचायती राज विभाग को नोडल विभाग बनाया गया है। राष्ट्रीय राजमार्गों और एक्सप्रेस-वे पर निराश्रित पशुओं की निगरानी के लिए विशेष गश्ती दल तैनात किए जाएंगे, जो लगातार पेट्रोलिंग करेंगे। आम लोगों की शिकायतों और सूचनाओं के त्वरित समाधान के लिए 24 घंटे का हेल्पलाइन सिस्टम सक्रिय रहेगा। जब तक नया पोर्टल और मोबाइल ऐप पूरी तरह से तैयार नहीं हो जाता, तब तक मुख्यमंत्री हेल्पलाइन 1905 को ही आधिकारिक हेल्पलाइन के रूप में इस्तेमाल किया जाएगा। एसओपी में यह भी तय किया गया है कि स्कूल, कॉलेज, अस्पताल, रेलवे स्टेशन, बस अड्डे और खेल परिसरों जैसे संवेदनशील सार्वजनिक स्थानों से आवारा कुत्तों और गोवंश को प्राथमिकता के आधार पर हटाया जाएगा। ऐसे पशुओं की पहचान कर उन्हें नजदीकी शेल्टर होम या गोसदन में सुरक्षित रूप से भेजा जाएगा। स्वास्थ्य सेवाओं को भी इस व्यवस्था से जोड़ा गया है। पशु हमलों की स्थिति में इलाज को बेहतर बनाने के लिए अस्पतालों में एंटी-रेबीज वैक्सीन, एंटीबॉडी इम्युनोग्लोब्यूलिन और आवश्यक दवाओं की उपलब्धता सुनिश्चित की जाएगी। इसके साथ ही चिकित्सकीय स्टाफ को विशेष प्रशिक्षण देकर एक समर्पित चिकित्सा तंत्र विकसित किया जाएगा। एसओपी के तहत निगरानी व्यवस्था को और प्रभावी बनाने के लिए राज्य और जिला स्तर पर समितियों का गठन किया गया है। राज्य स्तरीय समिति की अध्यक्षता प्रमुख सचिव या सचिव शहरी विकास करेंगे। यह समिति हर छह महीने में बैठक कर कार्यों की प्रगति की समीक्षा करेगी और रिपोर्ट सीधे मुख्य सचिव को सौंपेगी। जिला स्तर पर जिलाधिकारी की अध्यक्षता में समिति गठित की गई है, जिसमें सीएमओ, नगर आयुक्त, शिक्षा विभाग, लोक निर्माण विभाग, विकास विभाग और खेल विभाग के अधिकारी शामिल होंगे। यह समिति अपने-अपने जिलों में एसओपी के क्रियान्वयन पर नजर रखेगी। हाइवे सुरक्षा को लेकर एसओपी में विशेष प्रावधान किए गए हैं। राज्य के उन सभी हाईवे खंडों की मैपिंग की जाएगी, जहां नियमित रूप से आवारा कुत्ते या गोवंश दिखाई देते हैं। प्रत्येक ऐसे खंड के लिए एक नोडल अधिकारी नियुक्त किया जाएगा, जो जियो-टैग फोटो के साथ तुरंत जिला नियंत्रण कक्ष को सूचना देगा। सूचना मिलते ही नियंत्रण कक्ष पशु पकड़ दल या गश्ती दल को सक्रिय करेगा और सटीक लोकेशन तक पहुंचने में मदद करेगा। जनपद स्तर पर क्षेत्रीय पशु पकड़ दलों का गठन किया जाएगा। देहरादून, हरिद्वार, ऊधम सिंह नगर, पौड़ी और नैनीताल जैसे अधिक प्रभावित जिलों में प्रति जनपद दो बड़े और दो छोटे पिक-अप वाहन उपलब्ध कराए जाएंगे, जबकि अन्य जिलों में एक बड़ा और एक छोटा वाहन तैनात किया जाएगा। इसके साथ ही एक डिजिटल ऐप विकसित करने की भी योजना है, जिसमें सभी आश्रय स्थलों का लाइव डेटा उपलब्ध रहेगा। पशुओं को केवल उन्हीं शेल्टर होम्स में भेजा जाएगा, जहां क्षमता, भोजन और देखभाल की उचित व्यवस्था होगी। देहरादून, ऊधम सिंह नगर और नैनीताल में 100-100 श्वानों की क्षमता वाले दो-दो डॉग शेल्टर होम स्थापित किए जाएंगे। इन शेल्टर होम्स को एबीसी केंद्रों से जोड़ा जाएगा, ताकि उपचार और पुनर्वास की प्रक्रिया में किसी तरह की बाधा न आए। नई एसओपी के जरिए राज्य सरकार का दावा है कि आवारा पशुओं से होने वाली दुर्घटनाओं में कमी आएगी और आम लोगों को सुरक्षित और व्यवस्थित यातायात व्यवस्था का लाभ मिलेगा। उत्तराखंड में आवारा पशुओं पर सख्ती, नई एसओपी से सड़क सुरक्षा और जन-सुरक्षा को मिलेगा बल उत्तराखंड में आवारा कुत्तों और निराश्रित गोवंश से होने वाली दुर्घटनाओं और जनहानि को रोकने के लिए शहरी विकास विभाग ने मानक परिचालन कार्यविधि (एसओपी) लागू कर दी है। इस एसओपी के जरिए शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में जिम्मेदारियों को स्पष्ट करते हुए एक सशक्त, तकनीक आधारित और निगरानी-केंद्रित व्यवस्था विकसित की गई है। सरकार का उद्देश्य राष्ट्रीय राजमार्गों, एक्सप्रेस-वे और भीड़भाड़ वाले सार्वजनिक स्थलों से निराश्रित पशुओं को हटाकर सड़क दुर्घटनाओं में प्रभावी कमी लाना है। नई व्यवस्था के तहत शहरी क्षेत्रों में शहरी विकास विभाग और ग्रामीण इलाकों में पंचायती राज विभाग को नोडल एजेंसी बनाया गया है। राष्ट्रीय राजमार्गों और एक्सप्रेस-वे पर निराश्रित पशुओं की गतिविधियों पर नजर रखने के लिए विशेष गश्ती दल तैनात किए जाएंगे। आम लोगों की शिकायतों और सूचनाओं के लिए 24 घंटे की हेल्पलाइन व्यवस्था सक्रिय रहेगी। जब तक नया पोर्टल और मोबाइल ऐप पूरी तरह शुरू नहीं हो जाता, तब तक मुख्यमंत्री हेल्पलाइन 1905 को ही आधिकारिक माध्यम के रूप में इस्तेमाल किया जाएगा। एसओपी के अनुसार स्कूल, कॉलेज, अस्पताल, रेलवे स्टेशन, बस अड्डे और खेल परिसरों जैसे संवेदनशील सार्वजनिक स्थानों से आवारा कुत्तों और निराश्रित गोवंश को प्राथमिकता के आधार पर हटाया जाएगा। इन स्थानों पर पशुओं की पहचान कर उन्हें नजदीकी शेल्टर होम या गोसदनों में सुरक्षित रूप से भेजा जाएगा। इसके साथ ही अस्पतालों में एंटी-रेबीज वैक्सीन, एंटीबॉडी इम्युनोग्लोब्यूलिन और पशु हमलों से जुड़ी चिकित्सा सुविधाओं को और मजबूत किया जाएगा। स्वास्थ्य कर्मियों को विशेष प्रशिक्षण देने के साथ एक समर्पित उपचार तंत्र भी विकसित किया जाएगा। निगरानी व्यवस्था को प्रभावी बनाने के लिए राज्य और जिला स्तर पर समितियों का गठन किया गया है। राज्य स्तरीय समिति की अध्यक्षता प्रमुख सचिव या सचिव शहरी विकास करेंगे। यह समिति हर छह महीने में बैठक कर प्रगति की समीक्षा करेगी और रिपोर्ट मुख्य सचिव को सौंपेगी। वहीं जिला स्तर पर जिलाधिकारी की अध्यक्षता में गठित समिति एसओपी के क्रियान्वयन पर नजर रखेगी, जिसमें स्वास्थ्य, नगर निकाय, शिक्षा, लोक निर्माण, विकास और खेल विभाग के अधिकारी शामिल होंगे। हाईवे सुरक्षा को लेकर भी एसओपी में विशेष प्रावधान किए गए हैं। उन सभी हाईवे खंडों की मैपिंग की जाएगी, जहां निराश्रित गोवंश या आवारा कुत्ते नियमित रूप से देखे जाते हैं। प्रत्येक चिन्हित खंड के लिए एक नोडल अधिकारी नियुक्त होगा, जो जियो-टैग फोटो के साथ जिला नियंत्रण कक्ष को तुरंत सूचना देगा। सूचना मिलते ही पशु पकड़ दल या गश्ती टीम को मौके पर भेजा जाएगा। प्रभावित जिलों जैसे देहरादून, हरिद्वार, ऊधम सिंह नगर, पौड़ी और नैनीताल में अतिरिक्त वाहन और पशु पकड़ दल तैनात किए जाएंगे। इसके अलावा एक डिजिटल ऐप विकसित किया जाएगा, जिसमें सभी शेल्टर होम और गोसदनों की लाइव जानकारी उपलब्ध रहेगी। पशुओं को केवल उन्हीं आश्रय स्थलों में भेजा जाएगा, जहां क्षमता और देखभाल की पर्याप्त व्यवस्था होगी। देहरादून, ऊधम सिंह नगर और नैनीताल में 100-100 कुत्तों की क्षमता वाले डॉग शेल्टर होम स्थापित करने की भी योजना है, जिन्हें एबीसी केंद्रों से जोड़ा जाएगा ताकि उपचार और पुनर्वास की प्रक्रिया सुचारु बनी रहे।