Naravane Controversy: पूर्व सेना प्रमुख की किताब से मचा राजनीतिक तूफान, सत्ता और विपक्ष आमने-सामने
नई दिल्ली | 5 फरवरी 2026 पूर्व सेना प्रमुख की हाल ही में आई किताब ने देश की राजनीति में हलचल मचा दी है। किताब में किए गए कुछ खुलासों और टिप्पणियों के बाद राष्ट्रीय सुरक्षा, सेना और सरकार के रिश्तों तथा फैसलों की प्रक्रिया को लेकर नई बहस शुरू हो गई है। जैसे ही इसके अंश सामने आए, राजनीतिक गलियारों में बयानबाजी तेज हो गई और मामला संसद से लेकर सोशल मीडिया तक पहुंच गया। विपक्षी दलों ने किताब में उठाए गए मुद्दों को गंभीर बताते हुए सरकार से जवाब मांगा है। उनका कहना है कि जिन घटनाओं और निर्णयों का जिक्र किया गया है, वे उस समय की नीतियों और नेतृत्व की कार्यशैली पर सवाल खड़े करते हैं। विपक्ष का दावा है कि अगर ये बातें सही हैं, तो सरकार को संसद में स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए और पूरे मामले की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। वहीं सत्तारूढ़ दल ने इन आरोपों को सिरे से खारिज किया है। सरकार समर्थक नेताओं का कहना है कि किताब को राजनीतिक नजरिये से देखा जा रहा है और पूर्व सेना प्रमुख के निजी विचारों को सरकारी नीति से जोड़ना गलत है। उनका तर्क है कि सेना जैसे अनुशासित संस्थान को राजनीति से दूर रखना जरूरी है और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मामलों पर सार्वजनिक टिप्पणी से बचना चाहिए। इस विवाद पर सैन्य विशेषज्ञ और पूर्व अधिकारी भी बंटे हुए नजर आ रहे हैं। कुछ का मानना है कि एक पूर्व सेना प्रमुख को अपने अनुभव साझा करने का अधिकार है और इससे लोकतांत्रिक पारदर्शिता मजबूत होती है। वहीं दूसरे पक्ष का कहना है कि संवेदनशील जानकारियों के सार्वजनिक होने से सुरक्षा जोखिम बढ़ सकता है और सिविल-मिलिट्री संतुलन प्रभावित हो सकता है। राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, यह विवाद सिर्फ एक किताब तक सीमित नहीं है, बल्कि यह जवाबदेही, संस्थाओं की भूमिका और सत्ता के कामकाज जैसे बड़े सवालों को सामने लाता है। आने वाले दिनों में इस मुद्दे पर संसद और राजनीतिक मंचों पर बहस और तेज होने की संभावना है, जिससे यह मामला और गहराने के संकेत दे रहा है। Naravane Controversy: पूर्व सेना प्रमुख की किताब ने बढ़ाया सियासी तापमान, कई सवाल खड़े पूर्व सेना प्रमुख की हाल ही में प्रकाशित किताब को लेकर देश की राजनीति में तेज हलचल देखने को मिल रही है। किताब में किए गए कुछ खुलासों ने राष्ट्रीय सुरक्षा और सत्ता के फैसलों को लेकर नई चर्चा छेड़ दी है। जैसे ही इसके अंश सामने आए, राजनीतिक दलों के बीच बयानबाजी शुरू हो गई और मामला सुर्खियों में आ गया। विपक्षी दलों का कहना है कि किताब में जिन घटनाओं का जिक्र है, वे उस दौर की नीतियों और नेतृत्व की भूमिका पर सवाल उठाती हैं। विपक्ष का दावा है कि अगर ये बातें सही हैं तो सरकार को संसद में जवाब देना चाहिए और पूरे मामले की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए, ताकि सच्चाई सामने आ सके। दूसरी ओर, सत्तारूढ़ दल ने आरोपों को नकारते हुए कहा है कि किताब को राजनीतिक नजरिये से देखा जा रहा है। सरकार समर्थकों का मानना है कि पूर्व सेना प्रमुख के निजी विचारों को सरकारी नीति बताना गलत है और सेना जैसे संस्थान को राजनीति से दूर रखना जरूरी है। इस मुद्दे पर सैन्य विशेषज्ञ भी दो राय में बंटे नजर आ रहे हैं। कुछ लोग इसे अनुभव साझा करने की प्रक्रिया मानते हैं, जबकि अन्य का कहना है कि संवेदनशील जानकारियों का सार्वजनिक होना देश की सुरक्षा के लिए ठीक नहीं है। कुल मिलाकर, यह किताब अब देश की राजनीति में बड़े सवालों की वजह बन गई है।