रामजन्मभूमि मुक्ति आंदोलन में अखाड़ों की ऐतिहासिक भूमिका, मंदिर परिसर में संजोई जा रहीं संघर्ष की स्मृतियां
अयोध्या। 16 मार्च 2026 अयोध्या में भव्य राम मंदिर के निर्माण के साथ सदियों पुराने संघर्ष की यादें फिर से ताजा हो रही हैं। रामजन्मभूमि मुक्ति आंदोलन में विभिन्न वैष्णव अखाड़ों की महत्वपूर्ण भूमिका रही, जिन्होंने लंबे समय तक सनातन आस्था और धार्मिक स्थलों की रक्षा के लिए संघर्ष किया। इसी इतिहास को सम्मान देने के लिए रामजन्मभूमि परिसर में हुतात्मा स्मारक का निर्माण भी कराया जा रहा है, जहां संघर्ष में योगदान देने वाले संतों और बलिदानियों की स्मृतियों को संरक्षित किया जाएगा। इतिहास के अनुसार वर्ष 1528 में रामजन्मभूमि पर बने मंदिर को तोड़े जाने के बाद सनातन परंपराओं और आस्था के केंद्रों की रक्षा के लिए विरक्त-वैष्णव परंपरा से जुड़े संतों ने प्रतिरोध की शुरुआत की। बाद में इसी उद्देश्य से निर्मोही, निर्वाणी और दिगंबर जैसे अखाड़ों का गठन किया गया। इन अखाड़ों के गठन का श्रेय रामानंदीय संप्रदाय के प्रमुख आचार्य स्वामी बालानंदाचार्य को दिया जाता है, जिन्होंने उस समय सनातन संस्कृति पर हो रहे आक्रमणों को देखते हुए संतों को संगठित किया। अखाड़ों के गठन के बाद इन्हें अलग-अलग धार्मिक स्थलों की रक्षा और प्रतिष्ठा का दायित्व सौंपा गया। निर्वाणी और दिगंबर अखाड़ों को क्रमशः हनुमानगढ़ी और तिरुपति बालाजी मंदिर से जुड़े दायित्व दिए गए, जबकि निर्मोही अखाड़ा को रामजन्मभूमि की गरिमा और महिमा स्थापित करने की जिम्मेदारी सौंपी गई। 18वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में बाबा वैष्णवदास के नेतृत्व में इस संघर्ष को नया रूप मिला, जिसमें स्थानीय राजाओं और सामंतों को भी संगठित किया गया। इसी दौरान गुरु गोविंद सिंह से भी सहायता मांगी गई और उनके द्वारा निहंग सिखों का जत्था भेजा गया। समय के साथ यह संघर्ष न्यायिक प्रक्रिया के माध्यम से आगे बढ़ा, लेकिन अखाड़ों की भूमिका लगातार बनी रही। 19वीं शताब्दी में महंत गोविंददास द्वारा सरयू तट के गुप्तारघाट पर गुप्तारगढ़ी की स्थापना भी इस आंदोलन का महत्वपूर्ण केंद्र बनी। बाद के वर्षों में बाबा अभिरामदास और रामचंद्रदास परमहंस जैसे संतों ने भी इस परंपरा को आगे बढ़ाया। वहीं, हनुमानगढ़ी के गद्दीनशीन महंत प्रेमदास के शिष्य मामादास का मानना है कि राम मंदिर परिसर में बन रहे बलिदानियों के स्मारक के साथ-साथ विरक्त-वैष्णव अखाड़ों के योगदान को समर्पित एक अलग स्मारक भी बनाया जाना चाहिए, ताकि आने वाली पीढ़ियां इस संघर्ष और संतों के बलिदान को याद रख सकें। रामजन्मभूमि मुक्ति आंदोलन में अखाड़ों की ऐतिहासिक भूमिका, मंदिर परिसर में संजोई जा रहीं संघर्ष की स्मृतियां अयोध्या में बने भव्य राम मंदिर के साथ सदियों पुराने संघर्ष की यादें फिर से चर्चा में हैं। रामजन्मभूमि मुक्ति आंदोलन में वैष्णव परंपरा से जुड़े निर्मोही, निर्वाणी और दिगंबर जैसे अखाड़ों की महत्वपूर्ण भूमिका रही। इन अखाड़ों ने सनातन आस्था और धार्मिक स्थलों की रक्षा के लिए लंबे समय तक संघर्ष किया। इतिहास के अनुसार 1528 में मंदिर तोड़े जाने के बाद संतों और वैष्णव परंपरा के अनुयायियों ने प्रतिरोध शुरू किया। बाद में रामानंदीय संप्रदाय के आचार्य स्वामी बालानंदाचार्य के नेतृत्व में अखाड़ों का गठन किया गया, जिनका उद्देश्य धार्मिक स्थलों की रक्षा और सनातन संस्कृति को सुरक्षित रखना था। इन अखाड़ों को अलग-अलग धार्मिक स्थलों की जिम्मेदारी सौंपी गई। निर्मोही अखाड़ा को रामजन्मभूमि की गरिमा स्थापित करने का कार्य मिला, जबकि निर्वाणी और दिगंबर अखाड़ों को हनुमानगढ़ी और तिरुपति बालाजी मंदिर जैसे प्रमुख स्थलों से जुड़े दायित्व दिए गए। 18वीं शताब्दी में बाबा वैष्णवदास के नेतृत्व में इस संघर्ष को नया बल मिला। आज राम मंदिर परिसर में संघर्ष के बलिदानियों की स्मृति में स्मारक बनाया जा रहा है। संतों का मानना है कि वैष्णव अखाड़ों के योगदान को भी अलग से स्मारक के माध्यम से सम्मानित किया जाना चाहिए, ताकि आने वाली पीढ़ियां इस ऐतिहासिक संघर्ष को याद रख सकें।