Rama Ekadashi : रमा एकादशी के दिन जरूर पढ़ें यह व्रत कथा, पितृ दोष से मिलेगी मुक्ति!

By Tatkaal Khabar / 05-11-2026 07:29:53 am | 191 Views | 0 Comments
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Rama Ekadashi Katha 2026: रमा एकादशी आज, 5 नवंबर 2026, गुरुवार को मनाई जा रही है. हर साल कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि को यह व्रत रखा जाता है. दिवाली से करीब चार दिन पहले पड़ने वाली इस एकादशी का हिंदू धर्म में विशेष महत्व है. इस दिन भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की विधि-विधान से पूजा की जाती है. भगवान विष्णु के दामोदर स्वरूप और माता लक्ष्मी के रमा स्वरूप की आराधना करने से भक्तों को सुख-समृद्धि और सौभाग्य का आशीर्वाद मिलता है.

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, रमा एकादशी का व्रत रखने से व्यक्ति के जाने-अनजाने में किए गए पापों का नाश होता है और जीवन में सुख-शांति आती है. इस दिन भगवान विष्णु की पूजा के साथ रमा एकादशी की व्रत कथा पढ़ना और सुनना भी बेहद फलदायी माना जाता है. मान्यता है कि श्रद्धापूर्वक कथा का श्रवण करने और व्रत करने से पितरों को भी सद्गति मिलती है और पितृ दोष से मुक्ति पाने में सहायता मिलती है. कहा जाता है कि इस व्रत के प्रभाव से व्यक्ति को मृत्यु के बाद भगवान विष्णु के धाम में स्थान प्राप्त होता है.



अपना मूलांक जानें
रमा एकादशी 2026 शुभ मुहूर्त
पंचांग के अनुसार, इस साल रमा एकादशी की तिथि 4 नवंबर को सुबह से शुरू हो चुकी है और 5 नवंबर को सुबह समाप्त होगी. उदयातिथि के आधार पर आज ही एकादशी का व्रत रखा जा रहा है. व्रत और पूजा के लिए शुभ मुहूर्त इस प्रकार हैं.

एकादशी तिथि आरंभ: 4 नवंबर को सुबह 11:03 बजे
एकादशी तिथि समाप्त: 5 नवंबर को सुबह 10:35 बजे
ब्रह्म मुहूर्त: सुबह 5:00 बजे से 5:48 बजे तक
अभिजीत मुहूर्त: सुबह 11:43 बजे से दोपहर 12:26 बजे तक
गोधूलि मुहूर्त: शाम 5:33 बजे से 5:59 बजे तक
रमा एकादशी 2026 पारण का समय
रमा एकादशी का व्रत अगले दिन यानी द्वादशी तिथि को पारण करके खोला जाएगा. इस साल व्रत का पारण 6 नवंबर 2026, शुक्रवार को किया जाएगा.

पारण की तिथि: 6 नवंबर 2026, शुक्रवार
पारण का शुभ समय: सुबह 6:37 बजे से 8:48 बजे तक
रमा एकादशी व्रत कथा
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, रमा एकादशी की ये पावन कथा भगवान श्रीकृष्ण ने स्वयं धर्मराज युधिष्ठिर को सुनाई थी. कथा के अनुसार, प्राचीन काल में मुचुकुंद नाम के एक प्रतापी और धर्मात्मा राजा हुआ करते थे. वे भगवान विष्णु के परम भक्त थे. उनकी मित्रता इंद्र, यमराज, कुबेर, वरुण और विभीषण जैसे महान व्यक्तियों से थी. राजा की एक पुत्री थी, जिसका नाम चंद्रभागा था. उसका विवाह चंद्रसेन के पुत्र शोभन के साथ हुआ था.

राजा मुचुकुंद के राज्य में था एकादशी व्रत का कठोर नियम
एक बार शोभन अपनी पत्नी चंद्रभागा के साथ उसके मायके यानी राजा मुचुकुंद के राज्य में आए. उन दिनों कार्तिक मास चल रहा था और रमा एकादशी आने वाली थी. राजा मुचुकुंद के राज्य में एकादशी के दिन व्रत रखने का कठोर नियम था. इस दिन राज्य में कोई भी व्यक्ति अन्न ग्रहण नहीं करता था. यहां तक कि पशुओं को भी तिनका या घास नहीं खिलाया जाता था.

जब शोभन को इस नियम के बारे में पता चला, तो वे चिंता में पड़ गए. उनका शरीर पहले से ही काफी कमजोर और निर्बल था. उन्होंने अपनी पत्नी चंद्रभागा से कहा कि वे भूखे-प्यासे नहीं रह पाएंगे और व्रत रखने से उनके प्राण भी जा सकते हैं. इस पर चंद्रभागा ने उन्हें बताया कि उनके पिता के राज्य में एकादशी का नियम सभी के लिए अनिवार्य है. यदि वे व्रत नहीं रख सकते, तो उन्हें राज्य छोड़कर जाना होगा. आखिरकार शोभन ने अपनी मर्यादा और भाग्य पर भरोसा करते हुए व्रत रखने का फैसला किया.

एकादशी व्रत के दिन शोभन की मृत्यु
रमा एकादशी के दिन शोभन ने उपवास रखा और रातभर जागकर भगवान विष्णु का स्मरण किया. लेकिन भूख और प्यास के कारण उनकी हालत बिगड़ती चली गई. वे पूरे दिन और रात बेहद कष्ट में रहे. अगले दिन सूर्योदय होते-होते उनके प्राण निकल गए. शोभन की मृत्यु के बाद राजा मुचुकुंद ने पूरे विधि-विधान से उनका अंतिम संस्कार करवाया. वहीं, चंद्रभागा अपने पिता के घर रहकर पति के परलोक से जुड़े सभी कर्म करने लगीं.

रमा एकादशी के प्रभाव से मिला दिव्य नगर
कथा के अनुसार, रमा एकादशी का व्रत करने के पुण्य प्रभाव से मृत्यु के बाद शोभन को मंदराचल पर्वत के शिखर पर एक बेहद सुंदर और दिव्य नगर प्राप्त हुआ. यह नगर कुबेर के नगर के समान भव्य और सुख-सुविधाओं से भरा हुआ था. हालांकि, शोभन ने यह व्रत अपनी पूरी श्रद्धा से नहीं, बल्कि मजबूरी में किया था. इसी वजह से उनका दिव्य नगर स्थिर नहीं था और उन्हें हमेशा उसके नष्ट होने का डर बना रहता था.

ब्राह्मण ने चंद्रभागा को सुनाई शोभन की कहानी
एक दिन सोम शर्मा नाम के एक ब्राह्मण मंदराचल पर्वत की यात्रा पर पहुंचे. वहां उन्होंने शोभन को एक दिव्य सिंहासन पर बैठे देखा. शोभन ने ब्राह्मण को पहचान लिया और उनसे अपनी पत्नी चंद्रभागा तक यह संदेश पहुंचाने का अनुरोध किया. इसके बाद ब्राह्मण राजा मुचुकुंद के राज्य लौटे और उन्होंने चंद्रभागा को शोभन के दिव्य नगर के बारे में पूरी बात बताई.

ये समाचार सुनकर चंद्रभागा बेहद प्रसन्न हुईं. वह अपने पति के पास जाने के लिए वामदेव ऋषि के आश्रम पहुंचीं. वहां ऋषि के मंत्रों और आशीर्वाद से उन्हें दिव्य स्वरूप प्राप्त हुआ. मान्यता है कि चंद्रभागा ने आठ वर्ष की आयु से ही विधि-विधान के साथ एकादशी व्रत करना शुरू कर दिया था. उनके जीवनभर के एकादशी व्रतों का पुण्य भी उनके पास था.

पत्नी के पुण्य से स्थिर हुआ शोभन का दिव्य नगर
इसके बाद चंद्रभागा अपने पति शोभन के पास मंदराचल पर्वत पहुंचीं. वहां उन्होंने अपने जीवनभर किए गए एकादशी व्रतों का पूरा पुण्य शोभन को समर्पित कर दिया. पत्नी के इसी पुण्य प्रताप से शोभन का दिव्य नगर स्थिर हो गया. इसके बाद दोनों वहां सुखपूर्वक रहने लगे और उनका नगर प्रलय के अंत तक स्थिर रहा.

कथा के अंत में भगवान श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर से कहा कि जो भी व्यक्ति श्रद्धा और भक्ति के साथ रमा एकादशी का व्रत करता है, उसके ब्रह्महत्या जैसे बड़े पाप भी नष्ट हो जाते हैं.