यूएन में भारत ने रखा पक्षः एसडीजी के लिए वित्तीय व तकनीकी मदद जरूरी

By Tatkaal Khabar / 13-10-2026 03:34:51 am | 72 Views | 0 Comments
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न्यूयॉर्क। संयुक्त राष्ट्र के मंच पर भारत ने जलवायु परिवर्तन के खतरों से निपटने और सतत विकास लक्ष्यों (एसडीजी) को हासिल करने की दिशा में अपनी वैश्विक प्रतिबद्धता को दृढ़ता से दोहराया है। न्यूयॉर्क स्थित संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय में आयोजित अलग-अलग उच्च स्तरीय बैठकों के दौरान भारतीय राजनयिकों ने विकासशील देशों के हितों की रक्षा करने, वित्तीय मदद बढ़ाने और क्लीन एनर्जी के क्षेत्र में भारत की ऐतिहासिक उपलब्धियों का ब्योरा विश्व मंच पर साझा किया। यूएन स्थित भारत के स्थायी मिशन के अनुसार सतत विकास के विषय पर आयोजित संयुक्त राष्ट्र महासभा की दूसरी समिति की आम चर्चा में भारत का आधिकारिक बयान देते हुए मिशन की काउंसलर सौम्या नायर ने स्पष्ट किया कि एसडीजी को तेजी से लागू करने के लिए विकासशील देशों को पर्याप्त वित्त, टेक्नोलॉजी ट्रांसफर और क्षमता निर्माण की तत्काल आवश्यकता है। उन्होंने जोर देकर कहा कि इन सभी वैश्विक प्रयासों के केंद्र में गरीबी उन्मूलन होना चाहिए, जो वर्तमान समय की सबसे बड़ी प्राथमिकता है। क्लीन एनर्जी के क्षेत्र में भारत की अभूतपूर्व प्रगति को रेखांकित करते हुए काउंसलर नायर ने एक महत्वपूर्ण आंकड़ा साझा किया। उन्होंने बताया कि भारत की कुल स्थापित बिजली उत्पादन क्षमता में अब गैर-जीवाश्म ऊर्जा स्रोतों की हिस्सेदारी 55 प्रतिशत के ऐतिहासिक स्तर पर पहुंच गई है। इसके साथ ही उन्होंने आपदा जोखिम न्यूनीकरण के क्षेत्र में भारत की मजबूत शुरुआती चेतावनी प्रणालियों का जिक्र किया और साल 2030 में 'आपदा जोखिम न्यूनीकरण पर चौथे संयुक्त राष्ट्र विश्व सम्मेलन' की मेजबानी करने की भारत की पेशकश को भी दोहराया। दूसरी ओर, वैश्विक तापमान बढ़ने के कारण समुद्र के बढ़ते जलस्तर की चुनौती पर आयोजित एक अन्य महत्वपूर्ण सत्र में भारत ने 'पॉलिटिकल डिक्लेरेशन' (राजनीतिक घोषणापत्र) को सर्वसम्मति से अपनाए जाने का पुरजोर स्वागत किया। घोषणापत्र पर भारत का दृष्टिकोण प्रस्तुत करते हुए मिशन की फर्स्ट सेक्रेटरी पेटल गहलोत ने इस ऐतिहासिक कदम की सराहना की। गहलोत ने अपने संबोधन में तटीय क्षेत्रों और छोटे द्वीपीय विकासशील देशों की सुरक्षा के लिए अनुकूलन, लचीलेपन, अत्याधुनिक शुरुआती चेतावनी प्रणालियों और मजबूत अंतरराष्ट्रीय सहयोग की आवश्यकता पर विशेष बल दिया। उन्होंने स्पष्ट किया कि इस घोषणापत्र के बाद की जाने वाली सभी कार्रवाइयों में विकासशील देशों की राष्ट्रीय संप्रभुता और विकासात्मक प्राथमिकताओं का पूरा सम्मान किया जाना चाहिए। (रिपोर्ट. शाश्वत तिवारी)